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सुरेश राय

जन्म- महड़ौर, जिला गाजीपुर
(उ॰प्र॰)।
शिक्षा- बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, रुड़की
विश्वविद्यालय, तथा कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से। इन विश्वविद्यालयों से
इलेक्ट्रॅनिक्स इंजीनियरिंग में
क्रमशः स्नातक, स्नातकोत्तर, एवं आचार्य की उपाधि।
संप्रति-
अमेरिका में 1986 से कार्यरत। "लुजियाना स्टेट विश्वविद्यालय, बैटनरुज़" के
इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग में
प्रोफ़ेसर।
कविता और कहानी लेखन में रुचि। प्रकाशित कविता संग्रह "अनुभूति के दो स्वर" में एक
स्वर स्व.जयंती राय (पत्नी) तथा
दूसरा स्वर सुरेश का। अमेरिका से प्रकाशित हिंदी पत्रिका
"विश्व-विवेक" का कई वर्षों तक सह-संपादन भी किया।
संपर्क
suresh@ece.lsu.edu
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क्षितिज - तीन कविताएँ
(1)
क्षितिज के उस पार, धरती पर झुका आकाश फैला
प्यार के इज़हार की, अब कोई बंदिश नहीं।
नाद गर्जन से भरी, उल्लसित नदी ख़ामोश है
जलनिधि का सामना, करने की ताक़त नहीं।
इन पहाड़ों से कहो, जगह भी बदला करें
अच्छी सेहत के लिए, बैठना अच्छा नहीं।
आज-कल कल-आज में, रात-दिन बिखरा दिए
बंद मुट्ठी में पड़ा, कुछ क्षण कहीं जाता नहीं।
(2)
क्षितिज, अब तू बैठ जा।
गगनचारी पक्षियों से, तुमको हकारत ही मिली।
ऊँची-ऊँची चोटियों ने, सर्वदा दुत्कार दी।
थक गया होगा बहुत, भागता फिरता रहा।
क्षितिज, अब. . .
हाँ, बिठाकर गोद में सागर ने दुलराया कभी।
नाव मौजों की सजाकर, दूर पहुँचाया वही।
छल हुआ माना मगर, अब न इसको दिल लगा।
क्षितिज, अब. . .
गगन अवनी मिलन पीड़ा, ज़िंदगी सालक बनी।
दृश्य में विश्रांति है, शांति द्रष्टा में छिपी।
आ ज़रा आराम कर, संघर्ष ही चलता रहा।
क्षितिज, अब. . .
(3)
क्षितिज, तू भरमा गया।
आकाश धरती से मिले, प्रश्न पेड़ों से खड़े।
धरा की क्या विवशता, झुकते अंबर से सटे।
क्षितिज, तू पास आ गया।
पक्षियों से पंख ले, तितलियों का डोलना।
भागता फिरता रहा, ऍ छलावा बोल ना।
क्षितिज, तू क्या पा गया।
मानता हूँ दो किनारे मिल नहीं पाते कहीं।
पर नदी की भीड़ में, साथ चलते हैं वही।
क्षितिज, तू शरमा गया।
24 अप्रैल 2007
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