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अनुभूति में अभिज्ञात की रचनाएँ

अंजुमन में -
आइना होता
तराशा उसने
दरमियाँ
रुक जाओ
वो रात
सँवारा होता
सिलसिला रखिए
पा नहीं सकते

कविताओं में -
अदृश्य दुभाषिया

आवारा हवाओं के खिलाफ़ चुपचाप
शब्द पहाड़ नहीं तोड़ते
तुमसे
हवाले गणितज्ञों के
होने सा होना

गीतो में -
मीरा हो पाती

प्रीत भरी हो
तपन न होती
उमर में डूब जाओ
लाज ना रहे
मन अजंता
अब नहीं हो
रिमझिम जैसी

संकलन में -
प्रेमगीत-
आख़िरी हिलोर तक
गुच्छे भर अमलतास-
धूप

 

अदृश्य दुभाषिया

चिठि्ठयाँ आती हैं
आती रहती है
काग़ज़ी बमों की तरह हताहत करने
समूची संभावना के साथ

कौन-सा शब्द किस आशय से टकरा जाए
कहाँ
कहा नहीं जा सकता
हर शब्द खतरनाक हो सकता है

चिठि्ठयों को चाहिए जवाब
कहाँ है जवाब
किस ओर किसके पास

अगर चिठ्ठी हो मुझे ही संबोधित
लिखा हो मेरा ही नाम पता
जवाबदेही मेरी है
नाम बदल दूँ मसखरी में
तो तुम्हें भी घायल कर सकती है
या हड़बड़ी में अपनी समझ पढ़ बैठे कोई

अपना क्या नहीं होगा
नाम पता सम्बोधन के अलावा
क्या है जवाब?

समस्याएँ बहानों में कैसे तब्दील हो जाती है
नहीं जानता।

क्या काग़ज़, अंतरदेशी, लिफ़ाफ़े, पोस्टकार्ड
यह गुस्ताख दुभाषिए है
जो समस्या को बहाने में बदल देते हैं
चुपचाप
या स्याही की ठीक नहीं है नीयत

हवाएँ : जहाँ लिखी जा रही है चिठि्ठयाँ
पढ़ी जा रही है

कौन है वह अदृश्य दुभाषिया
कहना मुश्किल है
मगर चिठि्ठयाँ
अपने सही आशय के साथ
नहीं पहुँचतीं।

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

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