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अनुभूति में अभिज्ञात की रचनाएँ

अंजुमन में -
आइना होता
तराशा उसने
दरमियाँ
रुक जाओ
वो रात
सँवारा होता
सिलसिला रखिए
पा नहीं सकते

कविताओं में -
अदृश्य दुभाषिया

आवारा हवाओं के खिलाफ़ चुपचाप
शब्द पहाड़ नहीं तोड़ते
तुमसे
हवाले गणितज्ञों के
होने सा होना

गीतो में -
मीरा हो पाती

प्रीत भरी हो
तपन न होती
उमर में डूब जाओ
लाज ना रहे
मन अजंता
अब नहीं हो
रिमझिम जैसी

संकलन में -
प्रेमगीत-
आख़िरी हिलोर तक
गुच्छे भर अमलतास-
धूप

 

मन अजंता

किस तरह हमसे निभेंगे
ये नियम, चौरास्तों के
हम तुम्हारी याद में
जलते हुए, अवकाश है!

हर विविधता रास आए
मैं रसिक इतना नहीं हूँ
हर डगर की बाँह गह लूँ
मैं पथिक इतना नहीं हूँ
इक झलक अपनी दिखाकर
मेरे स्वप्नों को रिझाकर
हे प्रिये, तुम ही नहीं
लौटे कई मधुमास हैं!

है कई जन्मों का नाता
भावना की इस लगन में
वरना राहत क्यों अनोखी
शूल-सी गहरी चुभन में
तुम मिलोगी प्यास की
घाटी सदा गाए यही, पर
मोह के तावीज़ में भी
खोखले विश्वास हैं!

रूठ कर जाने लगीं
तरुणाइयाँ तो क्या हुआ
अपना रिश्ता तोड़ लीं
शहनाइयाँ तो क्या हुआ
साँस जब तक है, रचेगी
रास की डोली सजेगी
मन अजन्ता ने कभी
पाया नहीं संन्यास है

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

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