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अनुभूति में
अभिज्ञात की रचनाएँ
अंजुमन में -
आइना होता
तराशा उसने
दरमियाँ
रुक जाओ
वो रात
सँवारा होता
सिलसिला रखिए
पा नहीं सकते
कविताओं में -
अदृश्य दुभाषिया
आवारा हवाओं के खिलाफ़ चुपचाप
शब्द पहाड़ नहीं तोड़ते
तुमसे
हवाले गणितज्ञों के
होने सा होना
गीतो में -
मीरा हो पाती
प्रीत भरी हो
तपन न होती
उमर में डूब जाओ
लाज ना रहे
मन अजंता
अब नहीं हो
रिमझिम जैसी
संकलन में -
प्रेमगीत-आख़िरी हिलोर तक
गुच्छे भर अमलतास-धूप
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रिमझिम जैसी
तुम मेरे जीवन के मरुथल
में सावन की रिमझिम जैसी
आई हो लेकर रतनारे
नैनों में कुछ बातें ऐसी!
जीने का मतलब था खोया
तुमने ही आ अंकुर बोया
अब हँसने का मौसम आया
रोता था तब जी भर रोया
हर इक बात मेरी सरगम है
जब तुम हो इक सुमधुर लय-सी!
मिलने को आतुर मन मेरा
नाम तुम्हारे साँझ-सवेरा
निर्मम दुनिया के जंगल में
तुम ही मेरे एक बसेरा
छूट गया हर एक विशेषण
तुम ही मेरा कुल परिचय-सी।
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