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अनुभूति में अभिज्ञात की रचनाएँ

अंजुमन में -
आइना होता
तराशा उसने
दरमियाँ
रुक जाओ
वो रात
सँवारा होता
सिलसिला रखिए
पा नहीं सकते

कविताओं में -
अदृश्य दुभाषिया

आवारा हवाओं के खिलाफ़ चुपचाप
शब्द पहाड़ नहीं तोड़ते
तुमसे
हवाले गणितज्ञों के
होने सा होना

गीतो में -
मीरा हो पाती

प्रीत भरी हो
तपन न होती
उमर में डूब जाओ
लाज ना रहे
मन अजंता
अब नहीं हो
रिमझिम जैसी

संकलन में -
प्रेमगीत-
आख़िरी हिलोर तक
गुच्छे भर अमलतास-
धूप

 

शब्द पहाड़ नहीं तोड़ते

आदमी के रक्त में
निरंतर हिमोग्लोबीन कम होता जा रहा है
यह किसी डॉक्टर की रिपोर्ट नहीं
मेरी कविता पढ़कर भाँप सकते हो

अपनी कछुआ खंदकों से निकल कर कहता हूँ
किसी से न कहना कि तुमने मेरी बात सुनी है

सुनना कहने से अधिक ख़तरनाक हो सकता है

यह सुनकर तुम हाँफ जाओगे कि शब्द पहाड़ नहीं तोड़ते
पहाड़ का छोटा-सा पर्याय रचते हैं
यह तुम किसी पर्वतारोही से पूछो
कितनी अलंघ्य ऊँचाई होती है पहाड़ के पर्याय की
जिसकी यात्रा
आदमी को एक घुप अंधेरी भाड़ में झोंक देती है

जहाँ वह अपनी जयगाथा
उन पत्थरों से कहने को अभिशप्त है
जिनके कान अभी उगने को है।

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

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