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अनुभूति में अभिज्ञात की रचनाएँ

अंजुमन में -
आइना होता
तराशा उसने
दरमियाँ
रुक जाओ
वो रात
सँवारा होता
सिलसिला रखिए
पा नहीं सकते

कविताओं में -
अदृश्य दुभाषिया

आवारा हवाओं के खिलाफ़ चुपचाप
शब्द पहाड़ नहीं तोड़ते
तुमसे
हवाले गणितज्ञों के
होने सा होना

गीतो में -
मीरा हो पाती

प्रीत भरी हो
तपन न होती
उमर में डूब जाओ
लाज ना रहे
मन अजंता
अब नहीं हो
रिमझिम जैसी

संकलन में -
प्रेमगीत-
आख़िरी हिलोर तक
गुच्छे भर अमलतास-
धूप

 

उमर में डूब जाओ

आज तुम संयम की तज पतवार को
मेरी बाँहों के भँवर में डूब जाओ!
मेरे आँगन से तुम्हारी ड्योढ़ी तक
अनगिनत हैं प्यास के डेरे लगे
इक सुबह से लेके आधी रात तक
रोज ही इस स्वप्न के फेरे लगे
मैं तुम्हारे नाम का चिन्तन करूँ
तुम मेरे हस्ताक्षर में डूब जाओ!

लोग कहते हैं कि कोई गुम हुआ
औ, किसी ने है, किसी को पा लिया
कोई अपनी खो चुका आवाज़ तो
कोई सारे गीत उसके गा लिया
ये खबर चाहे नई हो या पुरानी
इस खबर के हर असर में डूब जाओ!

मंज़िलों से कौन-सा रिश्ता मेरा
और तुम जाकर किनारे, क्या करोगी
हो अगर जो नेह का संबल कोई
दुनिया के लाखों सहारे क्या करोगी
मैं तेरा हर एक क्षण अपना बना लूँ
और तुम मेरी उमर में डूब जाओ!

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

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