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अनुभूति में अभिनव शुक्ला की कविताएँ -
गीतों में-
अंतिम मधुशाला (हरिवंशराय बच्चन को श्रद्धांजलि)

अपने दिल के हर आँसू को
आवाज़ें

नहीं बयान कर सके
बांसुरी
वक्त तो उड़ गया
शान ए अवध
है बड़ी ऊँची इमारत

ज़िन्दगी है यही


हास्य-व्यंग्य में -
इंटरव्यू
काम कैसे आएगी
गांधी खो गया है
जेब में कुछ नहीं है
मुट्टम मंत्र
विडंबना

संकलन में
ज्योति पर्व -वो काम दिवाली कर जाए
                खुशियों से भरपूर दिवाली
गाँव में अलाव - कैसी सर्दी
प्रेमगीत - भावों के धागों को
गुच्छे भर अमलतास
नया साल-अभिनव नववर्ष हो
ममतामयी-मेरा आदर्श

 

अपने दिल के हर आँसू को...

अपने दिल के हर आँसू को फूल बनाना सीखा है
और दर्द के हर कतरे को शूल बनाना सीखा है।

हूँ कत्ल हुआ कई बार यहाँ इन सन्नाटी-सी गलियों में
है खून बहाया भी काफी इस दुनिया की रंगरलियों में
आँखों के काजल से मैंने तीरों को चलते देखा है
सावन के आँचल के टुकड़े को आग उगलते देखा है

गिर कर घायल हो धरती की छाती पर पाँव पसारे हैं
और कभी खड़े हो एक टाँग पर हफ्ते यहाँ गुज़ारे हैं
तुम हाथ में पत्थर को लेकर अब किसे डराने आए हो
मैंने हर लोहे के टुकड़े को धूल बनाना सीखा है।

तुम जिस आँसू की बाँह पकड़कर इतनी दूर चले आए
जिसकी ताक़त पर आज तलक सारे दस्तूर चले आए
वह तेरी हिम्मत के कारण तेरा साथी बन बैठा है
उसके आगे आँखे तेरी उसके पीछे मन बैठा है

रोने वाले का साथ मगऱ वह भी तो न दे पाता है
नज़रों के रस्ते देखो सबसे पहले छोड़ के जाता है
चाहे जितनी गहरी हों जितनी मज़बूती से जकड़े हों
हर बड़े वृक्ष के कण कण को निर्मूल बनाना सीखा है।

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है