अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्रामगौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजें
पुराने अंकसंकलनहाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

अनुभूति में अभिनव शुक्ला की कविताएँ -
गीतों में-
अंतिम मधुशाला (हरिवंशराय बच्चन को श्रद्धांजलि)

अपने दिल के हर आँसू को
आवाज़ें

नहीं बयान कर सके
बांसुरी
वक्त तो उड़ गया
शान ए अवध
है बड़ी ऊँची इमारत

ज़िन्दगी है यही

हास्य-व्यंग्य में -
इंटरव्यू
काम कैसे आएगी
गांधी खो गया है
जेब में कुछ नहीं है
मुट्टम मंत्र
विडंबना

संकलन में
ज्योति पर्व -वो काम दिवाली कर जाए
                खुशियों से भरपूर दिवाली
गाँव में अलाव - कैसी सर्दी
प्रेमगीत - भावों के धागों को
गुच्छे भर अमलतास
नया साल-अभिनव नववर्ष हो
ममतामयी-मेरा आदर्श

 

है बड़ी ऊँची इमारत

है बड़ी ऊँची इमारत और छोटे आदमी
किस तरह अब रास्तों के पार सोचे आदमी।

घूमते झूले चमकती बत्तियाँ और रोशनी
धूल का अंबार घुटती सांस रिसती चाँदनी
चन्द चेहरों पर मुखौटों की परत जमती हुई
और कुछ पर ज़िन्दगी की धूल है थमती हुई
विदेशी घास बहते ताल सहती मछलियाँ
तेज़ लिफ्टें खड़ी सीढ़ी पाँव मोंचें आदमी।

एक बचपन एक बचपन का गला पकड़े हुए
एक यौवन एक यौवन को कहीं जकड़े हुए
एक छोटी-सी तमन्ना एक बड़ा-सा फैसला
एक खुशबू पुष्प पूरी ताज़गी का सिलसिला
पढ़ के अब कानून हमदम आ गए हैं इस तरफ़
शौक से अब आदमी की खाल नोचे आदमी।

है बड़ी ऊँची इमारत और छोटे आदमी
किस तरह अब रास्तों के पार सोचे आदमी।

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है