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अनुभूति में अभिनव शुक्ला की कविताएँ -
गीतों में-
अंतिम मधुशाला (हरिवंशराय बच्चन को श्रद्धांजलि)

अपने दिल के हर आँसू को
आवाज़ें

नहीं बयान कर सके
बांसुरी
वक्त तो उड़ गया
शान ए अवध
है बड़ी ऊँची इमारत

ज़िन्दगी है यही

हास्य-व्यंग्य में -
इंटरव्यू
काम कैसे आएगी
गांधी खो गया है
जेब में कुछ नहीं है
मुट्टम मंत्र
विडंबना

संकलन में
ज्योति पर्व -वो काम दिवाली कर जाए
                खुशियों से भरपूर दिवाली
गाँव में अलाव - कैसी सर्दी
प्रेमगीत - भावों के धागों को
गुच्छे भर अमलतास
नया साल-अभिनव नववर्ष हो
ममतामयी-मेरा आदर्श

 

नहीं बयान कर सके...

नहीं बयान कर सके जो दास्ताँ गुज़र गई
अभी इधर थी रोशनी न जाने अब किधर गई।

ये चाहते रहे कि थोड़ी छाँव राह में मिले
हमें ज़रा-सी ज़िन्दगी तो उस पनाह में मिले
जिसकी खोज में भटक रहे हैं इक सवाल से
बन गए हैं आईने के सामने मिसाल से
मगर हमारे रास्तों पे गुल कभी न खिल सके
थे ख़्वाब में तो साथ न हकीकतों में मिल सके

धुएँ सी बनके उड़ गईं ये मुस्कराहटें यहाँ
न उनके घुंघरुओं की कभी आई आहटें यहाँ
उदास दर्द साथ हाथ की लकीर में दिखे
रहे बाज़ार में मगर कहीं कभी भी न बिके
वो उड़ गए चमन से किसी तेज़ बाज की तरह
न फिर दिखे वो लम्हें अपनी दूर तक नज़र गई।

नहीं बयान कर सके जो दास्ताँ गुज़र गई
अभी इधर थी रोशनी न जाने अब किधर गई।

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है