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अनुभूति में गुरमीत बेदी की कविताएँ—

अपने भीतर
कवि के भीतर
रेत के घरौंदे
सफ़र पर
हो सके तो

 

रेत के घरौंदे

जाने से पहले
मुझे पूरे करने हैं कई अधूरे काम
मसलन
करना है एक नदी से संवाद
जो बहती है मेरे अगल-बगल

लिखना है एक लंबा खत
पहाड़ों पर उतरती सुरमई शाम के नाम

पूछना है प्रवासी पंछियों से
कि वे कैसे रखते हैं
अपने परों में हज़ारों मील उड़ान का हौसला

पहाड़ों पर जाती पगडंडियों में
खोजने हैं पुरखों के कदमों के निशान

भेजनी हैं ढेरों शुभकामनाएँ
सफ़र पर निकले दोस्तों को

और कहना है
किसी की आँखों में झाँककर
कि अगली रुत में भी
यहीं बनाया करेंगे
रेत के घरौंदे!

16 फरवरी 2007

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