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अनुभूति में हरीश निगम की रचनाएँ—
नए गीतों में- ऊँघता बैठा शहर कहाँ जाएँ पनघटों पर धूल शेष हैं परछाइयाँ
शिशु गीतों में— धूप की मिठाई पंख दिला दो ना
गीतों में— इस नगर से चाँदनी सिसकी ज़िंदगी की बात
संकलन में— वसंती हवा – फागुन में ज्योतिपर्व – फुलझड़ियाँ लिख देतीं
रात भर जागे सिरहाने नींद धर के।
एक पल को भी नहीं पतझड़ थमा आँख में होते रहे बीहड़ जमा
याद ने किस्से सुनाए खंडहर के।
चाँदनी सिसकी कोई सपना दुखा सिलसिला हम पर खरोंचों का झुका
लग रहा, आए बबूलों से गुज़र के।
९ अक्तूबर २००
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