अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 

अनुभूति में हरीश निगम
की रचनाएँ—

नए गीतों में-
ऊँघता बैठा शहर
कहाँ जाएँ
पनघटों पर धूल
शेष हैं परछाइयाँ

शिशु गीतों में—
धूप की मिठाई
पंख दिला दो ना

गीतों में—
इस नगर से
चाँदनी सिसकी
ज़िंदगी की बात

संकलन में—
वसंती हवा – फागुन में
ज्योतिपर्व – फुलझड़ियाँ लिख देतीं

 

कहाँ जाएँ

पथराया नेहों का टाल कहाँ जाएँ
गली-गली फैले हैं जाल
कहाँ जाएँ

देख-देख मौसम के धोखे
बंद किए हारकर झरोखे
बैठे हैं
अंधियारे पाल
कहाँ जाएँ

आए ना रंग के लिफ़ाफ़े
बातों के नीलकमल हाफे
मुरझाई
रिश्तों की डाल
कहाँ जाएँ

कुहरीला देह का नगर है
मन अपना एक खंडहर है
सन्नाटे
खा रहे उबाल
कहाँ जाएँ?

१४ अप्रैल २००८

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

website metrics