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अनुभूति में हरीश निगम
की रचनाएँ—

नए गीतों में-
ऊँघता बैठा शहर
कहाँ जाएँ
पनघटों पर धूल
शेष हैं परछाइयाँ

शिशु गीतों में—
धूप की मिठाई
पंख दिला दो ना

गीतों में—
इस नगर से
चाँदनी सिसकी
ज़िंदगी की बात

संकलन में—
वसंती हवा – फागुन में
ज्योतिपर्व – फुलझड़ियाँ लिख देतीं

 

पनघटों में धूल

गाँव अब
लगते नहीं हैं
गाँव से!

पनघटों में धूल
सूने खेत
घूमते अमराइयों में प्रेत,
आ रही लू, नीम वाली
छाँव से!

ठूँठ अपनापन झरे
मन-पात
कोयलों पर बाज की है घात,
धूप के हैं थरथराते
पाँव से!

खाँसते
आँगन हवा में टीस
कब्र में डूबे घुने आशीष,
लोग हैं हारे हुए हर
दाँव से।

१४ अप्रैल २००८

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