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अनुभूति में हरीश निगम की रचनाएँ—
नए गीतों में- ऊँघता बैठा शहर कहाँ जाएँ पनघटों पर धूल शेष हैं परछाइयाँ
शिशु गीतों में— धूप की मिठाई पंख दिला दो ना
गीतों में— इस नगर से चाँदनी सिसकी ज़िंदगी की बात
संकलन में— वसंती हवा – फागुन में ज्योतिपर्व – फुलझड़ियाँ लिख देतीं
शेष हैं परछाइयाँ
फट गए सारे गुलाबी चित्र
सूख कर झरता हरापन और उड़ती धूल शेष हैं परछाइयाँ कुछ दर्द वाले फूल टीसते हैं फाँस जैसे मित्र
एक आदमखोर-चुप्पी लीलती दिन-रात और दमघोटू हवाएँ हर कदम आघात, खो गए काले धुएँ में इत्र
१४ अप्रैल २००८
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