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अनुभूति में हरि ठाकुर की रचनाएँ-

गीतों में-
किरन मंत्र
जो सन्नाटे को तड़का दे
फूलों ने अधर न खोले
वृक्ष खोजते अभय शरण
स्वर्णिम संकल नहीं बनूँगा
सूरज का रथ

 

जो सन्नाटे को तड़का दे

कोई तो ऋण आए ऐसी
जो फूलों को फिर महका दे।

फैली चारों ओर विरसता
कभी न कोई खुल कर हँसता
कितनी है घनघोर विवशता
कुछ तो सुलगे ऐसा जो
इस ठंडे लोहे को दहका दे।।
कोई तो ऋतु...

उब गए अभिनय दुहराते
बिना रीढ़ के दौड़ लगाते
काग़ज़ की नैया तैराते
कोई तो तोड़े पिंजरे को
जो हर पंछी को चहका दे।।
कोई तो ऋतु...

हम नौकर अपने शरीर के
हम फकीर अब तक लकीर के
निकल न पाए तिमिर चीर के
निकले कोई चीख गले से
जो सन्नाटे को तड़का दे।।

कोई तो ऋतु आए ऐसी
जो फूलों को फिर महका दे।।

१० मार्च २००८

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