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अनुभूति में हरि ठाकुर की रचनाएँ-

गीतों में-
किरन मंत्र
जो सन्नाटे को तड़का दे
फूलों ने अधर न खोले
वृक्ष खोजते अभय शरण
स्वर्णिम संकल नहीं बनूँगा
सूरज का रथ

 

स्वर्णिम संकल नहीं बनूँगा

जिन नयनों में कभी
नेह की नदी नहीं लहराई
उन नयनों के लिए
कभी मैं काजल नहीं बनूँगा।

भले टूट जाए यह अंतस
रहे शेष जीवन भर अपयश
किंतु शिलाओं के इंगित पर
बादल नहीं बनूँगा।

दल-दल में फँस जाय भले रथ
काँटों से घिर जाए हर पथ
किंतु, महल के दरवाज़े का
स्वर्णिम संकल नहीं बनूँगा।

जिन नयनों में कभी
नेह की नदी नहीं लहराई
उन नयनों के लिए
कभी मैं काजल नहीं बनूँगा।

१० मार्च २००८

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

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