अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 

अनुभूति में डॉ. इसाक 'अश्क' की रचनाएँ-

गीतों में-
ऋतु फगुनाई है
अलस्सुबह
कंठ का कोहनूर

चुनावी शोर
दिन सुगंधों के
फाल्गुन गाती हुई
धूप दिन
बौर आए

सपनों के घोड़े

चुनावी शोर

यह चुनावी शोर
तो बस
एक नारा झुनझुना है

जो ग़रीबों को
थमाया जाएगा
भीड़ पर
फिर
आज़माया जाएगा
जाल यह फंदा
चतुर कुछ
ख़ास हाथों ने बुना है
यह चुनावी शोर
तो बस
एक नारा झुनझुना है

बैनरों कट आउटों में
सज रहा है
हर जगह
जो टेप बनकर बज रहा है,
ध्यान से
सुनना जिसे
बेस्वाद बेलज़्ज़त गुना है
यह चुनावी शोर
तो बस
एक नारा झुनझुना है

२४ दिसंबर २००५

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

website metrics