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अनुभूति में डॉ. इसाक 'अश्क' की रचनाएँ-

गीतों में-
ऋतु फगुनाई है
अलस्सुबह
कंठ का कोहनूर

चुनावी शोर
दिन सुगंधों के
फाल्गुन गाती हुई
धूप दिन
बौर आए

सपनों के घोड़े

धूप दिन

फिर
हृदय को धूप दिन
भाने लगे

धुंध
शिखरों से लिपट-
आलाप भरती है
घाटियों में
शाम भजनों-सी
उतरती है

गाँव
गलियों के अधर
गाने लगे
फिर
हृदय को धूप दिन
भाने लगे

मौन
किस्सों से भरे-
भुतहा महल, जर्जर किले
दूर जाती
दृष्टियों
पगडंडियों के सिलसिले

दृश्य
जल में डूब
उतराने लगे
फिर
हृदय को धूप दिन
भाने लगे

२४ दिसंबर २००५

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