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फाल्गुन गाती हुई
आ गई
पिक नंदिनी
पंचम स्वरों में फाल्गुन गाती हुई।
बौर
गुच्छों से
सजी अमराइयाँ
इंदिवर होने लगी परछाइयाँ
घाटियों की
ठोस चुप्पी को
तरल गुंजार पहनाती हुई।
डहडहाते
टेसुओं की
आग से
भर उठा मन आक्षितिज अनुराग से
फूल-कलशों से
मदिर
रस-रूप छलकाती हुई।
१ मार्च
२००६ |