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डॉ. जगदीश व्योम

 

  हाइकु

क्यों तू उदास
दूब अभी है ज़िंदा
पिक कूकेगा।

लोक रोपता
महाकाव्य की पौध
लुनता कवि।

बादल रोया
धरती भी उमगी
फसल उगी।

स्वागत हुआ
दूब-धान आया
लोक जीवन।

मरने न दो
परंपराओं को कभी
बचोगे तभी।

नदी बनाता
सोख हवा से नमीं
वृद्ध पहाड़।

छीन लेता है
घनी मेघों से जल
दानी पहाड़

9 दिसंबर 2007

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