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अनुभूति में ज्योत्स्ना मिलन की रचनाएँ

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चार छोटी कविताएँ- भीतर तक, पीछे, होने का शब्द, सह्याद्रि के पहाड़ों में
तितली का मन
दरवाज़ा
पीठ
रात
लगातार
 

 

दरवाज़ा

यह एक समय है
जब कोई भी
तय नहीं कर पाता
कुछ भी
यह भी नहीं
कि उसे
दरवाज़ा खुला रखना चाहिए
या बंद।

हर बार
दरवाज़ा खोलते हुए
थोड़ा-सा
हिचकिचाता है हाथ
अक्सर
तय नहीं कर पाती
कि मैं
दरवाज़े के इस तरफ़ हूँ
या उस तरफ़।

१४ जनवरी २००८

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