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कविताओं में— अवाक औरत करवट कल चार छोटी कविताएँ- भीतर तक, पीछे, होने का शब्द, सह्याद्रि के पहाड़ों में तितली का मन दरवाज़ा पीठ रात लगातार
लगातार
एकाएक अपने पैरों को देखा तो भर उठी दहशत से बरसों पहले जहाँ गाड़ा गया था वहीं खड़ी थी मैं जिसका जो मन आया टाँगता चला गया थैला, टोपी, अंगोछा या अपनी थकान और लगता रहा सारे वक्त कि मैं चलती रही हूँ लगातार।
१४ जनवरी २००८
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