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बचकर रहना
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दस क्षणिकाएँ

गीतों में—
आ भाई सूरज
इस बस्ती मे
उजियारे के जीवन में

उम्र की चादर की
कहाँ गए
धूप की चादर
धूप ने
उदास छाँव
आसीस अंजुरी भर
लेटी है माँ

संकलन में—
नई भोर
नया उजाला

  इस सभा में चुप रहो

इस सभा में
चुप रहो
हुआ बहरों का
आगमन।

ये खड़े हैं
आईने के सामने
यह जानते हैं –
अपने ही
दाग़दार
चेहरे नहीं पहचानते हैं।
तर्क़ का
उत्तर बचा
केवल कुतर्कों
का वमन।

बीहड़ से चल
हर घर तक
आ चुके हैं
भेड़िए।
हैं भूख से
व्याकुल बहुत
इनको तनिक न
छेड़िए।
लपलपाती
जीभ खूनी
ज़हर भरे इनके वचन।

हलाल इनके
हाथ से
जनता हुई है
आजकल।
काटते रहेंगे हमेशा
लूट-डाके की फ़सल।
याद रखना
उतार लेंगे
लाश का भी
ये कफ़न।

२१ जुलाई २००८

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