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आ भाई सूरज
उम्र की चादर की
कहाँ गए
धूप की चादर
धूप ने
उदास छाँव
आसीस अंजुरी भर
लेटी है माँ

संकलन में—
नई भोर
नया उजाला

  कहाँ गए

कहाँ गए
वे लोग
इतने प्यार के
पड़ गए
हम हाथ में
बटमार के।
मौत बैठी
मार करके कुण्डली
आस की
साँझ न जाने
कब ढली
भेजता पाती न मौसम
है खुले पट
अभी तक दृग द्वार के।

बन गई सुधियाँ सभी
रात रानी
याद आती-
बात बरसों पुरानी
अब कहाँ दिन
मान के, मनुहार के।

गगन प्यासा
धूल धरती हो गई
हाय वह पुरवा
कहाँ पर सो गई
यशोधरा-सी
इस धरा को छोड़कर
सिद्धार्थ-से
बादल गए
इस बार के।

१ जनवरी २००५

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