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आ भाई सूरज
इस बस्ती मे
उजियारे के जीवन में

उम्र की चादर की
कहाँ गए
धूप की चादर
धूप ने
उदास छाँव
आसीस अंजुरी भर
लेटी है माँ

संकलन में—
नई भोर
नया उजाला

  उदास छाँव

नीम पर बैठकर
नहीं खुजलाता
कौआ अब अपनी पाँखें
उदास-उदास है अब
नीम तले की शीतल छाँव।

पनघट पर आती
कोई राधा
अब न बतियाती
पनियारी हैं आँखें
अभिशप्त-से अधर
विधुर-सा लगता सारा गाँव।

सब अपने में खोए
मर भी जाए कोई
छुपकर निपट अकेला
हर अन्तस रोए;
चौपालों में छाया
श्मशानी सन्नाटा
लगता किसी तक्षक ने
चुपके से काटा
ठिठक-ठिठक जाते
चबूतरे पर चढ़ते पाँव।

न जवानों की टोली
गाती कोई गीत
हुए यतीम अखाड़े
रेतीली दीवार-सी
ढह गई
आपस की प्रीत
गली-गली में
घूमता भूखे बाघ-सा अभाव।

१ जनवरी २००५

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