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अनुभूति में कमलेश भट्ट कमल की रचनाएँ—

नई रचनाओं में—
उम्र आधी हो चली है
ऐसा लगता है

क्या हुआ
मुकद्दर उसके जैसा

अंजुमन में—
झुलसता देखकर
न इसकी थाह है
नदी
नसीबों पर नहीं चलते
ना उम्मीदी में
पेड़ कटे तो
वहाँ पर
समंदर
हज़ारों बार गिरना है
हमारे ख्वाब की दुनिया

दोहों में—
छे दोहे

हाइकु में—
आठ हाइकु
होली हाइकु

  नदी

पास रक्खेगी नहीं, सब कुछ लुटाएगी नदी
शंख सीपी रेत पानी, जो भी लाएगी नदी।

आज है, कल को कहीं यदि सूख जाएगी नदी
होंठ छूने को किसी का, छटपटाएगी नदी।

बैठना फुरसत से दो पल, पास जाकर तुम कभी
देखना, अपनी कहानी खुद सुनाएगी नदी।

साथ है कुछ दूर तक ही फिर सभी को छोड़कर
खुद समंदर में किसी दिन डूब जाएगी नदी।

हमने वर्षों विष पिलाकर आज़माया है बहुत
अब हमें भी विष पिलाकर आज़माएगी नदी।

१ मई २००५


 

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