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अनुभूति में कुहेली भट्टाचार्य की रचनाएँ

कविताओं में-
इंतज़ार में रहेगा सवेरा
एक बीज
घास के वक्ष से
तुम भी ठहरो

रोशनी होगी
वादा
सौंधी सुगंध

 

तुम भी ठहरो

मेरी सुवह भी गीली थी
कल रात की तरह
मौसम में एक सूनापन है
सीने की गहराई में एक
मीठी-सी चुभन
दिल के उस कोने में
गहराई और ढलान है
याद एक ठहरी हुई है
कहता है मुझे
तुम भी ठहर जाओ
दो पल वो गीलापन
खंजर की तरह दागी एक
याद. . .
महकती है पहले चुंबन की तरह।
या वो स्पर्श जो यादों से उतरकर अगर
पक्षी की तरह हल्का
मन के ऊपर से बह जाए
धड़कन तेज़ होने लगती है।
हल्के हाथों से सूखे कपड़ों को
हटाते-हटाते बादल का रुख
समझने की कोशिश में
वो खंजर हिल जाता है थोड़ा-सा
दर्द ताज़ा होकर
सीने से रक्त टपकता रहता है
और रातें भी भीग जाती हैं।

9 मई 2007

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