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अनुभूति में मधु मोहिनी उपाध्याय की रचनाएँ

गीतों में—
क्या बतलाएँ दिल की बातें
थक कर बैठ न जाना राही
बेटियाँ
सपने में रंग गई कान्हा के रंग

अंजुमन में--
सागर खारा पाया क्यों

हास्य व्यंग्य में—
मधु की जगह माध्वी बन जाएँ
कुत्ता मंद-मंद मुस्कान फेंकता

 

बेटियाँ

आज खिली हैं इस आँगन में, चल देंगी कल द्वार से
चहक रहीं हैं आज न जाने, उड़ जाएँ कब डार से

हाय ब्याह की रीत है ऐसी, अपना घर ही बना विदेसी
सीखी जिससे जीवन सरगम, दूर उसी झंकार से

किन-किन यत्नों से था पाला, अपना तन-मन-धन दे डाला
हाय! विदा के संग विदा ली, खुशियों ने संसार से

हाय! यही होता गठबंधन, उर में रहता मेरे क्रंदन
आर्त रुदन कितने सुनती हूँ क्रूर नियति के वार से

चहक रही थीं कल तक देखो व्याकुल हैं उस डार-पर
खिली-खिली थीं इस आँगन में मुरझाई पतझार से

जग में पूजित है जब नारी, भेदभाव फिर क्यों है भारी
डूब रही हैं हाय बचा लो कोई इन्हें मँझधार से

1 सितंबर 2007

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