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अनुभूति में मधु मोहिनी उपाध्याय की रचनाएँ

गीतों में—
क्या बतलाएँ दिल की बातें
थक कर बैठ न जाना राही
बेटियाँ
सपने में रंग गई कान्हा के रंग

अंजुमन में--
सागर खारा पाया क्यों

हास्य व्यंग्य में—
मधु की जगह माध्वी बन जाएँ
कुत्ता मंद-मंद मुस्कान फेंकता

 

कुत्ता मंद-मंद मुस्कान फेंकता

एक दिन हमारे कुत्ते ने पड़ोसी को काटा
कुत्ते की पत्नी ने ज़ोर से डाँटा
कि काटने के लिए
इस आदमी को छाँटा
अब देखना इसके रक्त-कण
तेरे रक्त कणों में मिल जाएँगे
और तेरे आचरणों से
कौम के सभी कुत्ते हिल जाएँगे
अब कुत्ता
रोज़ सुबह कोठी के बाहर
टहलने के बहाने
स्कूल जाती लड़कियों को देखता
भौंकने या काटने की बजाय
उन पर मंद-मंद मुस्कान फेंकता
स्कूटर पर जाती सुंदरी को देख
पीछे-पीछे रेस करता
आँखों से ओझल होते ही दुःखी फेस करता
दिन-भर की ताक-झाँक से थका कुत्ता
रात को बेहोश सोने लगा
हमारे घर का सामान धीरे-धीरे
चोरी होने लगा
कुत्ते की वफ़ादारी बिल्कुल मर चुकी थी
क्योंकि उसमें पड़ोसी की आत्मा
प्रवेश कर चुकी थी
लेकिन पड़ोसी का स्वभाव
बिल्कुल भी चेंज नहीं हुआ
कुत्ते से कुछ भी एक्सचेंज नहीं हुआ
हम सोचने लगे
कि काश आदमी में भी
यदि कुत्ते जैसी वफ़ादारी होती
तो संस्कृति आज अपनी पहचान यों न खोती
लेकिन आज आदमी के पास आदमीयत कम रकम बढ़ रही है
जो उसे अपने ही बनाए चक्रव्यूह में जकड़ रही है

1 सितंबर 2007

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