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अभिव्यक्ति में नरेश अग्रवाल की
रचनाएँ-

इंतज़ार
कितने ज़माने से
खिलाड़ी
रेगिस्तान
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इंतज़ार

रेलगाड़ी चली गई है
और रह गया है गाँव वहीं का वहीं।
शायद वो शाम तक लौटेगा
छोटे से घर में कमी खटकती है
उसके न रहने की
बड़े-बूढ़े शाम तक इंतज़ार करते रहेंगे
उसके आने का।
धूप तेज़ हो गई है
दरवाज़े बंद हो गए हैं घरों के
शाम होते ही मिलने-जुलने लगते हैं लोग।
आस-पास को मालूम है
वह गया है दूसरे गाँव
सभी को उत्सुकता है
वो कुछ नई ख़बर लाएगा वहाँ की,
बातचीत मन बहलाने का साधन
और एक आदमी कम है आज की बैठक में
शायद वापसी की ट्रेन में
सुलगा रहा हो बीड़ी
और याद कर रहा हो घर को
आज उसे गर्म रोटियाँ और सब्ज़ी नहीं मिलेगी
देर रात तक चुल्हे बुझ चुके होंगे
जाग रही होगी केवल उसकी पत्नी
और पिता करवट बदलते हुए
थका हुआ वो लौटेगा
और स्वागत के लिए कुछ भी नहीं,
खाना-पीना, बीड़ी और रात की गाढ़ी नींद
और सुबह उत्साह से काम पर निकल जाना है।

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