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तीन होली रचनाएँ-
छोड़ दे अब तो
रूप तुम्हारा
होली

अंजुमन में-
अपना जीवन
किस्मत ने
परदा इतना झीना कैसा
बैर
मुझपे अगर नज़र
मेहनत का पैगाम
याद जब आए
हादसे

कविताओं में-
बावजूद इसके

संकलन में—
वर्षा मंगल–बरखा रानी

  बावजूद इसके

बावजूद इसके
कि अपने वजन से ज़्यादा भारी
बस्ता लेकर
रोज़ सुबह
स्कूल जाती है वह,
बावजूद इसके
कि हर रोज़
खो देने के लिए अपनी पेंसिल
या फाड़ देने के लिए कोई किताब
अपने पापा के हाथों
मार खाती है वह,
बावजूद इसके
कि गुड्डे-गुड़ियों का
ब्याह करने की जगह
उसे पसंद है
अपनी सहेली के साथ
मिहिर-तुलसी का खेल खेलना
बावजूद इसके
कि वह जानती है
केवल उतने ही
फूलों और प्राणी-पक्षियों के नाम
जितने छपे हुए हैं
उसकी पाठय-पुस्तकों में
और उनमें से
ज़्यादातर के उसने
केवल चित्र ही देखे हैं,
बावजूद इसके
कि उसे नापसंद है
गोभी के पराठे और मूँग का हलवा,
दादी की बनाई पुदीने की चटनी
और दही की लस्सी
मगर
पित्ज़ा, बर्गर, पेटिस
और कोक उसे बहुत भाता है,
बावजूद इसके
कि उसे नहीं पता है
'ओम जय जगदीश हरे'
किस देवता की आरती है
और मोदक
किस देवता को चढ़ाया जाता है,
बावजूद इसके
कि अटकती है वह
हिंदी बोलते हुए
और अंग्रेज़ी में करती है
धाराप्रवाह बातें,
मेरे सामने वाले
घर में रहने वाली
छ: साल की लड़की
मानसून में भी
ईद के चाँद की तरह
गाहे-बगाहे
दिखाई देने वाली बारिश में
अपना बालकनी में आकर
भीगती है,
खेलती है,
नाचती है उन्मुक्त होकर
तो तमाम बातों के बावजूद
न जाने क्यों
महसूस होता है मुझे
कि ख़त्म नहीं हुआ है सब कुछ,
अब भी बाकी है
एक किरण उम्मीद की।

१६ अक्तूबर २००५  

 

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