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अनुभूति में प्रेमरंजन अनिमेष की रचनाएँ—

अंजुमन में—
नई रुत (लंबी ग़ज़ल)

कविताओं में—
बंद
बचे हुए लोग
बाज़ार में इंतज़ार
लिफ़्टमैन
लौटना

 

बचे हुए लोग

जिस गाड़ी के तीन डिब्बे नदी में गिर गए
उसके चौथे डिब्बे में थे वे
घर की चाबी छूट जाने के कारण
वह जहाज़ छूट गया था उनसे
जिसका अपहरण कर यात्रियों को
मार डाला गया
सुबह का शो देखकर आए थे वे
बम फटा शाम जिस सिनेमाघर में
उनके ठीक बगल के घर में एक आदमी
सरकारी महकमे के नाम रखकर चिट्ठी
आत्मघात कर लेता है दूसरा
पेशाब करते पुलिस द्वारा पीटा जाकर
पर वे आश्वस्त रहते हैं
सरकार और पुलिस में उनकी पहचान के
आदमी हैं पानी वैसे भी वे
कम पीते हैं
दाढ़ी बनाते
चेहरे के किसी कोने में
धार से छूटे बाल की तरह वे
मगर लगता है
बचना संयोग नहीं उनका
विधान है
बीतते हैं जैसे जैसे गिनती के
दिन गिनती के बचते हैं।
बंद कर देते रोशनदान एहतियाततन
ऊँची उठा लेते चहारदीवारी
और जड़ देते उसमें टूटे काँच
दरवाज़ों के पीछे दरवाज़े घर नहीं
घर में बनाते तहखाने
और तहख़ानों से निकालते सुरंग
नंगे तार से सटकर मर जाता घर का कुत्ता
दूर का रिश्तेदार आपरेशन की छुरी से
नकली शराब से पूरी झोपड़पट्टी में
बचता नहीं एक भी कमाने वाला
दुर्घटनाओं के आते समाचार
तो देख लेते कहीं उनका नाम तो नहीं
अख़बार में पढ़ते
यहाँ बाढ़ आई वहाँ काँपी धरती
प्राकृतिक अप्राकृतिक मानवीय अमानवीय
आपदाओं में मारे गए सैकड़ों
पर यह सब विचलित चिंतित नहीं करता
क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय पृष्ठ पर है देश में नहीं
देश में प्रदेश प्रदेश में नगर
नगर का समाचार स्थानीय पृष्ठ पर नहीं
स्थानीय पृष्ठ में घर नहीं
अख़बार में घर की कोई ख़बर नहीं
जो हादसे उन्होंने देखे हैं
उसके भी नहीं चश्मदीद गवाह
कभी कहीं किया नहीं विरोध
वे चाहते और हासिल कर लेते
ओहदे अशर्फियाँ पुरस्कार
ख़ास समय और मौसम में निकलते हैं
मिलते हैं ख़ास लोगों से
उन्हीं से रखते संबंध
क्योंकि उनकी नज़र में
ख़ुद बचे हुए ही
बचा सकते हैं रिश्ते भी
एक भूमिगत संगठन है उनका
जिसकी गुपचुप आपात बैठकें होतीं
जब-तब पड़ता कान में उनके
कुछ और तरह के लोग हैं
जिनके चलते बची है यह दुनिया
तो टकराकर गिलास
हँसते हिमहास
बचे हुए लोगों के पास
बचा हुआ भरोसा है
धू-धू कर जलती पृथ्वी में
बचा लेंगे वे अपना टापू
कहीं नहीं बची दुनिया
तो वे होंगे उसके नायक!

16 अक्तूबर 2007

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