रेत सागर
वह भी एक वक्त था
सड़कें सुनसान
द्वार बंद
आँधी घमासान
हर वृक्ष
टूट कर गिरता हुआ
जाते तो कहाँ जाते?
रेत के टीलों के पार
नज़र कुछ भी नहीं आता था
साथ चलता था एक परिवार
छोटा-सा
बार-बार मुँह ऊपर उठा कर देखती थी
छोटी बिटिया
उँगली थामे
बिना कुछ बोले
कहाँ है अंत?
पिता दूरदृष्टि जमाए था
आगे की ओर
इस सबसे निर्लिप्त
उसे पार करना था
यह रेत सागर
माँ दोनों के बीच
कभी बेटी की ओर देखती
कभी पति की ओर
दोनों का एक-एक हाथ थामे
कोई छूट न जाए
न भूख थी
न प्यास
न पड़ाव
कभी-कभी
कैसा अंतहीन होता है —
सफ़र!