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अनुभूति में राकेश गुप्ता की रचनाएँ

कविताओं में-
जीवन का सफ़र
मन
लोग

 

लोग

कुएँ में सिमटी दुनिया
कहाँ तक?
घर की चारदीवारी तक
दूकान के शटर तक
या ऑफ़िस के मेज़ जितनी चौड़ी।

सब अपने-अपने कुनबे समेटे
अपने-अपने घोसले तक।

गोल धरती पर
गोल-गोल घूमते लोग
कुछ दो पैरों जितनी दूरी चलते
कुछ चार पहियों से ज़मीन पर. . .
जी भर के भागते लोग।

कुछ दाएँ कुछ तथाकथित बाएँ चलते
अपने-अपने अनंत की ओर अग्रसर।

कुछ नोट की पर्चियों में उलझे
कुछ उगने की जगह खोजते
अपनी-अपनी जीवनी पढ़ते
स्टोव में हवा भरते लोग।

1 मई 2007

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