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अनुभूति में राकेश कौशिक की
रचनाएँ -

नई रचनाएँ-
अब मुझको आवाज़ न देना।
कब से खड़े हैं
जो इधर था
स्वप्न में कल आई थी तुम।
सब का सब कुछ

अंजुमन में—
इंसान बदल जाएगा
तुम नज़र से दूर हो
मिट्टी उड़ती है
मेरी धरती के लोगों
हर सहारा
हवाओँ में

कविताओँ में —
आशा दीप
एक दीपक जल गया है
और बरस थोड़ा सा बादल
ऋतुचक्र
किसे मन की बात कह लूँ
कोहरा ये कब हटेगा
कौन कहता है देश जागा है
गीत मेरे हैं तुम्हारे
जाने क्यों
जो न झुकते थे
जो फ़ोर्स
तुम न आए
तुमने मुझे पुकारा होगा
नव जीवन
बादलों तुम आ गए फिर
भटके भटके हुए
मन में छाया घोर अंधेरा
महानगर
मेरा शहर बदल गया
मेरा वतन बदल गया
समय काटे नहीं कटता
सूरज का इंतज़ार
हम बंजारे
हम मछुआरे
है कठिन पथ
प्रेम गीत-आज उनसे
जग का मेला-मेरा भैया

यदि आज है दुख

 

सब का सब कुछ

सब का सब कुछ अगर अच्छा होता
फिर तो हर आदमी ख़ुदा होता।

साथ मेरे ज़मीर है वरना
संग मेरे भी क़ाफ़िला होता।

सोना कुंदन भला कैसे बनता
आग में गर न वो तपा होता।

दर्द मेरा वो समझता शायद
झुग्गियों में अगर रहा होता।

पूछ लेता अगर कोई हमसे
हाले-दिल हमने भी कहा होता।

बाद मुद्दत के न मिलता वो अगर,
ज़ख़्म क्यों फिर मेरा हरा होता।

9 मार्च 2007

 

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।