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अनुभूति में रविशंकर की रचनाएँ —

नए गीत-
अनुवाद हुई ज़िंदगी
एक विमूढ़ सदी
खो गई आशा
गाँव और घर का भूगोल
जल रहा है मन
बीते दिन खोए दिन
हम शब्दों के सौदागर हैं

अंजुमन में-
ग़ज़ल

कविताओं में
इस अंधड़ में 

पौ फटते ही

गीतों में-
एक अदद भूल
गहराता है एक कुहासा
पाती परदेशी की
भाग रहे हैं लोग सभी
ये अपने पल
हम अगस्त्य के वंशज

संकलन में- 
गाँव में अलाव – दिन गाढ़े के आए 
प्रेमगीत – यह सम्मान
गुच्छे भर अमलतास – जेठ आया

 

खो गई आशा

मिली थी
मिलकर कहीं फिर
खो गई आशा
कौन जाने
कब कहाँ क्या-
हो गई आशा?

सुबह का-
बेखबर होकर
देर तक सोना
रोशनी का-
इस तरह से
बेवफ़ा होना
कह रहा-
जगकर तुरत
फिर सो गई आशा।

हवाओं का बेवजह
दिन-रात बस
अफवाह ढोना
इस गुज़रते दौर का
इस कदर
लापरवाह होना
हँसी थी-
हँसकर सभी कुछ
रो गई आशा।

अकेले का अचानक
एकांत में भी
भीड़ होना
और बेचारे शहर का
भीड़ में वनवास ढोना
यों मुहजबानी
गाँव घर की
हो गई आशा

२८ जनवरी २००८

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