अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 


अनुभूति में रेखा कल्प की रचनाएँ

तुतलाता बचपन
बुझा न देना दीप प्राण का
मेघा बरस बरस अंबर से
सौ-सौ नमन

 

 

तुतलाता बचपन

जीवन के बीहड़ कानन में
कहीं खो गया मेरा बचपन।
पल-पल गाता निश्छल हँसता
मलय-वात-सा मेरा बचपन।।

ढूँढ़ू पल्लव की मृदुता में
बिरवों की नवकोमलता में,
हार-सिंगार की कलियों में
महका-महका सुंदर बचपन।
कहीं खो गया मेरा बचपन।।

ढूँढूँ, उषा की वेला में
झर-झर-झर झरते निर्झर में,
अस्फुट वाणी के शब्दों में
किलकाता तुतलाता बचपन।
कहीं खो गया मेरा बचपन।।

ढूँढूँ सीपी के मेले में
रंग-बिरंगे पाषाण-कणों में,
रेत के नम घरौंदे में
क्षण में लड़ता, क्षण में मिलता,
नित अभिनव-सा पुलकित बचपन।
कहीं खो गया मेरा बचपन।।

16 मार्च 2007

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।