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अनुभूति में सजीवन मयंक की
रचनाएँ -

नई क्षणिकाएँ-
पाँच क्षणिकाएँ

अंजुमन में-
अजब यह माजरा देखा
आकाश साफ़ है
ज़िंदगी सिर्फ़ पानी रही
तूफ़ान से टकराते हैं
नचाते रहे पहले कठपुतलियाँ
भटक रहे हैं बाबू जी
याद आता है
सभी को लुत्फ़ आता है
हमको कोई गिला नहीं

कविताओं में-
जीवन क्या है
दीये का वक्तव्य

गीतों में-
अमावस का दर्
असीम स्वर खटक रहे हैं
खेतों में जिनका देवालय
गीता हो रहीम के घर में
पथ के विंध्याचल

संकलन में-
मेरा भारत-
आज तिरंगा फहराता है शान से
माटी चंदन है
मातृभाषा के प्रति-
हिंदी ने हमको एक रखा
हिंदी में कितना अपनापन
जग का मेला-
बंदर मामा

 

भटक रहे हैं बाबूजी

कल के राजा आज सड़क पर भटक रहे हैं बाबूजी।
खूनी रिश्ते धीरे-धीरे चटक रहे हैं बाबूजी।।

यहाँ ज़िंदगी है सरकस-सी केवल खेल तमाशा है।
सच पूछो तो सभी हवा में लटक रहे हैं बाबूजी।।

अंधकार में किसी तरह तो रास्ता कुछ तय होता था।
तेज उजाले अब आँखों को खटक रहे हैं बाबूजी।।

सर पर लटक रही तलवारें केवल कच्चे धागों से।
कितनी बेफ़िक्री से हम सब मटक रहें हैं बाबूजी।।

इज़्ज़त का सौदा होता है सड़कों पर चौराहों पर।
संविधान सारे अपना सर पटक रहे हैं बाबूजी।।

जीने का अधिकार हमें है मरने पर है पाबंदी।
इसीलिए बहुतेरे मुर्दे भटक रहे हैं बाबूजी।।

इस रस्ते पर ख़ास सवारी शायद आने वाली है।
आम आदमी धीरे-धीरे सटक रहे हैं बाबूजी।।

आग लगाकर ताप रहे हैं सब अपने-अपने घर को।
जो कहते थे हम इस घर के घटक रहे हैं बाबूजी।।

झूठों के सिर ताज यहाँ पर और सत्य को तख़्ता है।
इसीलिए हम सच कहीं में भटक रहे हैं बाबूजी।।

24 अगस्त 2006

 

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