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अनुभूति में सजीवन मयंक की
रचनाएँ -

नई क्षणिकाएँ-
पाँच क्षणिकाएँ

अंजुमन में-
अजब यह माजरा देखा
आकाश साफ़ है
ज़िंदगी सिर्फ़ पानी रही
तूफ़ान से टकराते हैं
नचाते रहे पहले कठपुतलियाँ
भटक रहे हैं बाबू जी
याद आता है
सभी को लुत्फ़ आता है
हमको कोई गिला नहीं

कविताओं में-
जीवन क्या है
दीये का वक्तव्य

गीतों में-
अमावस का दर्
असीम स्वर खटक रहे हैं
खेतों में जिनका देवालय
गीता हो रहीम के घर में
पथ के विंध्याचल

संकलन में-
मेरा भारत-
आज तिरंगा फहराता है शान से
माटी चंदन है
मातृभाषा के प्रति-
हिंदी ने हमको एक रखा
हिंदी में कितना अपनापन
जग का मेला-
बंदर मामा

 

नचाते रहे पहले कठपुतलियाँ

जो नचाते रहे पहले कठपुतलियाँ।
उनके हाथों की सारी कटी उँगलियाँ।।

तेज़ रफ़तार से जो चले थे कभी।
क्या खड़े होंगे फिर से कटी उँगलियाँ।।

बात लाखों की खुलकर मिली खाक में।
चाहकर न दुबारा बँधी मुट्ठियाँ।।

द्वार स्वागत के जिनके लिए थे खुले।
आज उनके लिए बंद हैं खिड़कियाँ।।

जिनकी ख़बरों से आकाश गुंजित रहा।
अब भटकते हैं ज्यों वे पते चिट्ठियाँ।।

इस तरह वक्त बदला है हम क्या कहें।
आसमाँ पर गिरी लौटकर बिजलियाँ।।

24 अगस्त 2006

 

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