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अनुभूति में सजीवन मयंक की
रचनाएँ -

नई क्षणिकाएँ-
पाँच क्षणिकाएँ

अंजुमन में-
अजब यह माजरा देखा
आकाश साफ़ है
ज़िंदगी सिर्फ़ पानी रही
तूफ़ान से टकराते हैं
नचाते रहे पहले कठपुतलियाँ
भटक रहे हैं बाबू जी
याद आता है
सभी को लुत्फ़ आता है
हमको कोई गिला नहीं

कविताओं में-
जीवन क्या है
दीये का वक्तव्य

गीतों में-
अमावस का दर्
असीम स्वर खटक रहे हैं
खेतों में जिनका देवालय
गीता हो रहीम के घर में
पथ के विंध्याचल

संकलन में-
मेरा भारत-
आज तिरंगा फहराता है शान से
माटी चंदन है
मातृभाषा के प्रति-
हिंदी ने हमको एक रखा
हिंदी में कितना अपनापन
जग का मेला-
बंदर मामा

 

तूफ़ान से टकराते हैं

लोग जो तूफ़ान से टकराते हैं
ठोकरें खाते हैं मुसकुराते हैं

वक्त के साथ-साथ चलते जो
अपना इतिहास खुद बनाते हैं

लोग उन्हें देवता समझते हैं
गीत जो आदमी के गाते हैं

उसने महफ़िल में कब बुलाया है
फिर भी हम हैं कि रोज़ आते हैं

पसीने की बूँद को पारस समझो
खेत के खेत लहलहाते हैं

धर्म को व्यापार समझने वाले
रोज़ गीता की कसम खाते है

रेत के महलों में कौन रहता है
हवा चलती है बिखर जाते है

 

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।