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नई रचनाएँ- कागज़ पर चिराग जिसमें एक दास्तान है यारों परिवर्तन सीमा हमको ऐसी सज़ा दीजिए क्षितिज
गीतों में- कुछ कदम हम चलें घोर यह अँधेरा है ये सब कुदरत की बातें हैं
व्यंग्य में- आधुनिक गीता
अंजुमन में- उनमें वादों को निभाने का हुनर होता है उसका नहीं है हमसे सरोकार दोस्तों ये कहाँ ज़िंदगी भी ठहरी है
चिराग
कोई भी शै, यहाँ, कायम नहीं सदा के लिए, हवा ने, उसकी रौशनी भी बुझा ही डाली, पर वो एक चिराग है, क्या, यही काफ़ी नहीं है?
24 मार्च 2007
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