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उसका नहीं है हमसे सरोकार दोस्तों
ये कहाँ ज़िंदगी भी ठहरी है

 

घोर ये अंधेरा है

घोर ये अँधेरा है,
दूर ये सवेरा है,
प्रेम गीत कैसे कहूँ।

वो भी एक सदी थी, दूध की नदी थी
सच्चाई ज़्यादा और कम बदी थी,
खून अब तो बहता है, मनवा ये कहता है
मैं इसमें कैसे बहूँ,
प्रेम गीत कैसे कहूँ।

गांधी का देस है और वही भेस है
सत्ता की देखिए जिनमें ये रेस है
पक्के लुटेरे हैं, संसद को घेरे हैं
नाकामियों को सहूँ,
प्रेम गीत कैसे कहूँ।

वो है राजधानी, जिसकी ये कहानी
आबरू लुटें वहाँ, मौत की रवानी
दिल कहाँ धड़कता है, दर्द से फड़कता है
खामोश कब तक रहूँ
प्रेम गीत कैसे कहूँ।

जग में ये रीत हो सच की ही जीत हो
नफ़रत को छोड़ दे हर दिल में प्रीत हो
जुल्फ़ फिर सँवारूँगा रूप फिर निहारूँगा
चुप भी मैं कैसे रहूँ
प्रेम गीत क्यों ना कहूँ।

9 जून 2006

 

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