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उनमें वादों को निभाने का हुनर होता है
उसका नहीं है हमसे सरोकार दोस्तों
ये कहाँ ज़िंदगी भी ठहरी है

 

उसका नहीं है हमसे सरोकार दोस्तों

उसका नहीं है हमसे सरोकार दोस्तों
हमने बनाई अपनी जो सरकार दोस्तों।

आवाज़ अपनी कैसे ले जाओगे वहाँ
तुम आम आदमी हो वो दरबार दोस्तों।

जाने वो कब निकाल दें फ़रमान मौत का
हर रोज़ सुबह देखना अख़बार दोस्तों।

जिनके लिए लड़े थे अपने वतनपरस्त
वो मुद्दे आज हो गए बेकार दोस्तों।

हर चीज़ बिक चुकी अब सरकार बिकेगी
दीवार पर पढ़ा था इश्तहार दोस्तों।

हर भाव बेच दें अब ईमान अपना लोग
मिल जाए उनको गर कोई ज़रदार दोस्तों।

विश्वास पर जियोगे तो रोज़ मरोगे
खुद अपना हमको करना है उद्धार दोस्तों।

9 जून 2006

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