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अनुभूति में संतोष कुमार सिंह की रचनाएँ —

नए गीत
अपना छोटा गाँव रे
इस देश को उबारें
ये बादल क्यों रूठे हैं
सोचते ही सोचते

गीतों में
ऐसी हवा चले
गाँव की यादें
जा रहा था एक दिन
धरती स्वर्ग दिखाई दे
नारी जागरण गीत
मन जुही सा
मीत मेरे
श्रमिक-शक्ति

शिशु गीतों में-
डॉक्टर बंदर
भालू
सूरज
हिरण

संकलन में
ममतामयी-माँ

 

सोचते ही सोचते

यह सोचते ही सोचते सब उम्र पूरी हो गई।
इंसान की मुस्कान क्यों आधी-अधूरी हो गई।

देखिए हर भाल पर
चिंता की रेखा खिंच रहीं।
नफ़रत के उपवन सिंच रहे और नागफनियाँ खिल रहीं।
इंसान से इंसान की अब क्यों है दूरी हो गई।
यह सोचते ही सोचते. . .

कुछ त्रस्त हैं कुछ भ्रष्ट हैं
कुछ भ्रष्टता की ओर हैं।
हो रहीं ग़मगीन संध्याएँ सिसकती भोर हैं।।
वह सुहागिन माँग क्यों कर बिन सिंदूरी हो गई।
यह सोचते ही सोचते. . .

इंसान पशुता पर उतारू
हो रहा नैतिक पतन।
यह देख कर माँ भारती के हो रहे गीले नयन।
प्रेम की क्यों भावना भी विष धतूरी हो गई।
यह सोचते ही सोचते. . .

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।