अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 


अनुभूति में शबनम शर्मा की रचनाएँ-

नई रचनाएँ-
अमानवता
आज़ादी
खुशबू
तस्वीर
प्रश्न
बाबूजी के बाद
मजबूरी
रंग
रिश्ते

कविताओ में-
इक मा
इल्ज़ाम
बूढ़ी आँखें
बेटियाँ
मकान
माँ
मुसाफ़िर
रंग
सपना
सिर्फ़ तुम हो

 

आज़ादी

कितनी ही आँखें
बाट जोए बैठी थीं
किसी भाई, बहन, बाप-माँ का,
सुबह पहुँचना था उन्हें
अपने-अपने घर,
किस संगदिल ने
उनकी सुबह को स्याह
काली रात में बदल दिया
शायद हम भूल गए
हमने आज़ादी कैसे पाई
गुलामी भी इतनी क्रूर न थी
आज हम ही अपने दुश्मन हो गए,
भाई-भाई खून का प्यासा
बन गया,
जहाँ कहीं भी हाथ बढ़ते हैं
समझौते के शांति के,
क्यों आख़िर क्यों काट
दिये जाते हैं अपने

स्वार्थों के लिए।

24 अप्रैल 2007

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।