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खुशबू

यादों की इक सोंधी-सी
खुशबू, पीहर की गली
शुरू होते ही आने लगती,
खोलते ही घर का दरवाज़ा
आमने-सामने हो जाते मैं
और वो बीते पल,
आज वही आँगन, वही दीवारें
मुझे मुँह चिढ़ाती
जो कभी कोयल-सी कूकती थी
रात-दिन।
बाबूजी की कुर्सी धूल चाट रही
और वो हुक्का न जाने किधर
गुड़गुड़ा रहा
माँ का चूल्हा पहचान में
नहीं आ रहा
जो सेंकता था अनगिनत रोटियाँ
व लज़ीज़ पकवान
कहाँ खो गई वह सब रौनकें
मिल-बैठ खाना,
छीनना, छिनवाना, कभी
लड़ पड़ना एक तस्तरी हेतू,
वक्त बदल गया है
पीहर भी बदलेगा ही
लंबी आह से भरती हूँ कदम
जहाँ समय सिमट गया है
रिश्तों के साथ।

24 अप्रैल 2007

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