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मकान

मैंने अपने मकान की
सारी खिड़कियाँ बंद कर ली हैं
व गाड़े रंग के परदे भी
खींच लिए हैं
कि कोई आवाज़ मेरे कमरे तक
न आए।
फिर भी कई आवाज़ें
सुनाई देती हैं मुझे,
बुलाती हैं मुझे,
और मैं उन्हें सुनकर भी
सुनना नहीं चाहती
क्योंकि हर खिड़की जब भी
खुली, ठंडी-गर्म हवा
के सिवा कुछ न दे सकी
अब मैं बंद कमरे में
सुनना चाहती हूँ अपने
अंदर के अंधेरे सन्नाटे
की आवाज़, जलाना चाहती
इक मद्धम-सी लौ, जो
ढूँढ़ने दे मुझे
अंदर छिपी इक औरत को
जो सिसकी है वर्षों से
मेरी देह के इस मकान में निष्प्राण।

9 नवंबर 2006

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