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सिर्फ़ तुम हो

 

सिर्फ़ तुम ही हो

तुम्हारी याद,
कभी भीनी खुशबू संग,
तो कभी सीली हवा
लेकर आती, छूती मुझे,
अंतस्थल हिलाती,
मेरा उपहास उड़ाती,
ठहर-सी जाती,
देखने मेरा आँसुओं का सैलाब,
कभी सिसकियों भरी कश्ती,
फिर सवार होती मेरे
हृदय के मानस पटल पर,
अंकित करती अपने कुछ
चमकते शब्द।
मैं समझती ये तुम्हारी याद
है या मेरे निश्छल
प्यार की लहरों से निकले
वो माणिक जिनके सहारे
मैं जीवन नैया खे रही।
सवाल-जवाब मिलने से पहले ही

साँसों में विलीन हो जाता, जिसमें
सिर्फ़ तुम - सिर्फ़ तुम ही हो।

9 नवंबर 2006

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