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अनुभूति में शैलेन्द्र चौहान की
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संकलन में
गुच्छे भर अमलतास-मरुधरा
                -आतप
                -विरक्ति

  कोंडबा

कर रहा यह कौन
ध्वनि
खच-खच की यहाँ
किस तरफ़?
पार्श्व में
दाएँ या बाएँ

सामने दीख पड़ता नहीं कुछ भी
दूर तक
चहारदीवारी ऊँची
पृष्ठ भाग में सड़क एक
पतली-सी

काटता कोई हेज या
गुलाबों की टहनियाँ
दे रहा आकार छोटे-छोटे
रूपहले पौधों को

दोनों हाथों से चलाता
लचीला टीन की तलवार
घास और खरपतवार
कर रहा साफ़
सुनाई दे रही ध्वनि लगातार
कौन है वह
श्रमिक, सैनिक, चौकीदार?

ध्वनियों का
नित्य प्रति का साथ
बाग में माली
लकड़हारा जंगल में
मजदूर
सड़कों, इमारतों के बनाने में

ठक ठक वसूले की
गैंती की धप्प
खर-खर आरा मशीनों की
मोटरगाड़ियों के इंजिनों का शोर
सांठ-गांठ अमरीका की
हिन्दुस्तानी, पाकिस्तानी सस्ते मजूर हैं

रमेश की बाटी कैथ की तरह
फूल गई थी
देशी घी में डूब डाब कर
चिकनी चुपड़ी चूर चार हो
बूरे में लिपट लपट कर
मुँह में घुली जा रही थी

कुश्तला की ग्रामीण बैंक में
परिचर वह
दो हज़ार रुपए का नौकर
घर गृहस्थी को धक्का देकर
ठीक ठीक निभा रहा था
गजानन तो पूरा किसान
दिल बहुत बड़ा
खातिरदारी को तत्पर सदैव
मेहनत से कुछ बेहतर पा जाने की
धुन में जीता था

दाल, बाटी, चुरमा के ये कारीगर
हम जैसों की स्वादग्रंथि के
बस साधक थे

कारखानों में लोहपट्टों का
गलना और ढलना
हथोड़े की मार
उत्पादन अनेक किस्मों के
गोरैया की चिऊं चिऊं
कठफोड़वा की खट-खट
रंभाना गायों का

फंतासी नही यह
न रहस्य ही कोई घना
बहुत ही सरल औ'साधारण
यह तथ्य
वास्तविक और सच

पीछे पतली सड़क के किनारे
बारिश में उगी घास वह छीलता
फावड़े से अनथक
वृद्ध आदिवासी वह गौंड़

जानता हूँ वर्षों से उसे
देखता घास ढ़ोते हुए
खींचते कचरे की टूटी हुई ठेली
नालियों का साफ़ करते मैल
संभ्रांत लोगों के घरों से
चमकाते बाथरूम और
लेटरिन की टाइलें, कमोड़

उम्र पचहत्तर वर्ष
नाम कोंडबा
दिखा नहीं सकते दया भी उस पर
अदम्य बल उसके देह, जांगर में

बहसें संसदों और असेम्बलियों
निरंतर होती हों जहाँ
सबल नागरिकों के पराभव को
वैध साबित करने की
पेप्सी, कोकाकोला को निर्मल
बताने की

रिश्वतों को रक्षानुकूल, सैनिकानुकूल
बनाने की
तब इस राष्ट्र में कोंडबा के
नागरिक पराभव का खाता
कौन ऑडिट करेगा?

हाथ, घुटने, पेट की तकलीफ का
बीमा कहाँ होगा?
कौन मरने पर कोंडबा के
शोक प्रस्ताव लाएगा?
प्रेस में जाएगा कहने कौन
देश की भारी क्षति हुई है
न रहने पर कोंडबा के
चलती रहेगी घास पर तलवार उसकी
घास बढ़-बढ़ कर कटती रहेगी,
बढ़ती रहेगी

बहस संसद में चलती रहेगी
देशहित में
कोंडबा जीता रहेगा
मरता रहेगा
अनजान संसद से
संसद भी जारी रहेगी
बेअसर अनजान
अस्तित्व से उसके

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

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