अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 


अनुभूति में शरद तैलंग की रचनाएँ

नई गज़लें
घर की कुछ चीज़ें पुरानी
जो अलमारी में

मुक्तक में
तीन मुक्तक

कविताओं में
जाने क्यों
नींद
फूलों का दर्द
लाचारी
लेखक ऐसे ही नहीं बनता है कोई 
सिलवटें

अंजुमन में
अपनी करनी
अपनी बातों में
आपका दिल
आप तो बस
आबरू वो इस तरह
इस ज़मीं पर
उस शख्स की बातों का
जब दिलों में
तलवारें
दिल के छालों
पत्थरों का अहसान
पुराने आईने में
मंज़ूर न था
यारी जो समंदर को
लड़कपन के दिन
समंदर की निशानी

गीतों में
मनवीणा के तार बजे
मेरी ओर निहारो
सीढ़ियाँ दर सीढ़ियाँ

 

आबरू वो इस तरह

आबरू वो इस तरह अपनी बचाने में लगे हैं
घर के दरवाज़ों पर अब पर्दे लगाने में लगे हैं।

जब खड़े न रह सके हम आईने के सामने
कुछ न सूझा बत्तियाँ घर की बुझाने में लगे हैं।

क्यों भला फिर आज ऐसे लोग बैठे हैं वहां पर
मु तों से जिन सभी के चित्र थाने में लगे हैं।

हमने साँसों से ये सीखा रात दिन चलते रहो
रहनुमा ही राह में कांटे बिछाने में लगे हैं।

मन्दिर और मस्जिद के मसले में भले कुछ हो न हो
कम अज़ कम कुछ लोग रब का नाम ध्याने में लगे हैं।

अपनी सब शर्मो-हया जो बेचता बाज़ार में
हमने देखा लोग उसके गीत गाने में लगे हैं।

अपनी कमियों को नज़र अंदाज़ करते थे 'शरद'
दूसरों की ख़ामियाँ सबको गिनाने में लगे हैं।

1  जनवरी 2005


 

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।